हिन्दू धर्म ग्रंथों में सात ऐसे महामानवों का वर्णन है जो अजर अमर है और आज भी इस धरती पर उपस्थित है, हनुमान जी उनमे से एक है। हाल ही में सेतु एशिया नामक एक वेबसाइट ने दावा किया है कि इस धरती पर एक ऐसी जगह है जहाँ के लोगों से मिलने हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद आते हैं और कुछ दिन वहां रहने के बाद वापस चले जाते है। लेकिन हनुमान जी केवल उनसे मिलने ही हर 41 साल में क्यों आते है और उनसे मिलकर वो क्या करते है, इस बारे में सेतु एशिया ने अपनी वेबसाइट पर विस्तृत शोध प्रकाशित किया है जो आप इस लेख के आखिर में दिए गए लिंक पर पढ़ सकते है। हम यहाँ पर उनके शोध के मुख्य अंश प्रकाशित कर रहे है।सेतु एशिया के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है। यह मातंग आदिवासी समुदाय है। सेतु एशिया के अनुसार हनुमान जी हर 41 साल में इनसे मिलने आते है।वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है।कहते हैं कि जब प्रभु श्रीरामजी ने अपना मानव जीवन पूरा करके जल समाधि ले ली थी, तब हनुमानजी पुनः अयोध्या छोड़कर जंगलों में रहने चले गए थे। किष्किंधा आदि जगह होते हुए वे लंका के जंगलों में भ्रमण हेतु गए। उस वक्त वहां विभीषण का राज था। विभीषण को भी चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त था।
हनुमानजी ने कुछ दिन श्रीलंका के जंगलों में गुजारे जहां वे प्रभु श्रीराम का ध्यान किया करते थे। उस दौरान पिदुरु पर्वत में रहने वाले कुछ मातंग आदिवासियों ने उनकी खूब सेवा की। उनकी सेवा से प्रसंन्न होकर हनुमानजी ने उनको वचन दिया कि प्रत्येक 41 साल बाद में तुमसे मिलने आऊंगा। यही कारण है कि हनुमानजी आज भी इस वचन का पालन करते हैं।सेतु वेबसाइट का दावा है कि मातंगों के पास एक ऐसा रहस्यमय मंत्र है जिसका जाप करने से हनुमानजी सूक्ष्म रूप में प्रकट हो जाते हैं। वे आज भी जीवित हैं और हिमालय के जंगलों में रहते हैं। जंगलों से निकलकर वे भक्तों की सहायता करने मानव समाज में आते हैं, लेकिन किसी को दिखाई नहीं देते।
मातंगों अनुसार हनुमानजी को देखने के लिए आत्मा का शुद्ध होना जरूरी है। निर्मल चित्त के लोग ही उनको देख सकते हैं। मंत्र जप का असर तभी होता है जबकि भक्त में हनुमानजी के प्रति दृढ़ श्रद्धा हो और उसका हनुमानजी से आत्मिक संबंध हो।
सेतु का दावा है कि जिस जगह पर यह मंत्र जपा जाता है उस जगह के 980 मीटर के दायरे में कोई भी ऐसा मनुष्य उपस्थित न हो जो आत्मिक रूप से हनुमानजी से जुड़ा न हो। अर्थात उसका हनुमानजी के साथ आत्मा का संबंध होना चाहिए।
मंत्र : कालतंतु कारेचरन्ति एनर मरिष्णु , निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु।
यह मंत्र स्वयं हनुमानजी ने पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले कुछ आदिवासियों को दिया था। पिदुरु (पूरा नाम पिदुरुथालागाला Pidurutalagala) श्री लंका का सबसे ऊंचा पर्वत माना जाता है।
सेतु एशिया की वेबसाइट www.setu.asia पर इस संबंध में विस्तार से अब तक तीन अध्याय पोस्ट किए हैं। अध्याय का संक्षेप विवरिण
अध्याय 1 : इस अध्यया में बताया गया है कि पिछले साल एक रात कैसे उन्हें हनुमानजी दिखाई दिए और उन्होंने क्या कहा। सेतु अनुसार हनुमानजी ने मातंगों को एक बच्चे के पिछले जन्म की कहानी सुनाई।
अध्याय 2 : दूसरे अध्याय अनुसार मातंगों के साथ हनुमानजी ने किस तरह शहद की खोज की और वहां क्या क्या घटनाएं घटी।
अध्याय 3 : तीसरे अध्याय को सबसे रोचक और रहस्यमय माना जाता है। पूर्व के पन्नों पर दिए गए मंत्र का अर्थ और उसके संबंध में विस्तार से इस अध्याय में बताया गया है। इस अध्याय में समय की अवधारण का भी समझया गया है जैसे कि जब हम लोग (मनुष्य) समय के बारे में सोचते हैं तो हमारे मन में घड़ी का विचार आता है, लेकिन हनुमानजी तो चिरंजीवी हैं।
हनुमानजी या अन्य कोई भगवान् जब समय के बारे में सोचते हैं तो उन्हें समय के धागों (तंतुओं ) का विचार आता है। अर्थात उनके लिए धरती का समय क्षणिक ही है। हिन्दू कालगणना अनुसार मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का एक दिन ही होता है।